आरक्षण आंदोलन 2026: सवर्ण से लेकर पिछड़े वर्ग तक - क्यों बढ़ रहा असंतोष?
भारत में आरक्षण प्रणाली (Reservation System) हमेशा से सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा हथियार रही है। लेकिन 2026 की शुरुआत के साथ ही, यह मुद्दा एक बार फिर देश की सड़कों और अदालतों में गूँज रहा है। जहाँ एक तरफ ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास है, वहीं दूसरी ओर योग्यता (Merit) और आर्थिक समानता के सवाल खड़े हो रहे हैं।
📍 सवर्ण और 'Save Merit' आंदोलन
दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सामान्य वर्ग (General Category) के छात्र संगठन "समान अवसर" की मांग को लेकर मुखर हैं। उनका तर्क है कि 50% से अधिक आरक्षण की सीमा पार होने के कारण प्रतिभावान युवाओं को उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों से बाहर होना पड़ रहा है। 'Save Merit' रैलियों में इस बार तकनीक और डेटा के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि कैसे ओपन सीटें लगातार कम हो रही हैं।
"आरक्षण का आधार केवल जाति नहीं, बल्कि वर्तमान आर्थिक स्थिति होनी चाहिए ताकि हाशिए पर खड़ा हर व्यक्ति, चाहे वो किसी भी वर्ग का हो, आगे बढ़ सके।"
📍 EWS कोटा: विस्तार या सीमा?
10% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण ने सवर्णों के एक बड़े हिस्से को राहत तो दी है, लेकिन अब आंदोलन इसकी 'आय सीमा' (Income Limit) को लेकर है। कई राज्यों में मांग की जा रही है कि 8 लाख की वार्षिक सीमा को महंगाई के अनुसार बदला जाए। साथ ही, कुछ समूह इस 10% को बढ़ाकर 15% करने की पैरवी कर रहे हैं।
📍 SC/ST और OBC: उप-वर्गीकरण का विवाद
2024-25 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद, SC/ST समुदायों के भीतर 'उप-वर्गीकरण' (Sub-categorization) को लेकर गहरा असंतोष है। अगस्त 2024 में हुए 'भारत बंद' का असर 2026 में भी दिख रहा है। आंदोलकारी समूहों का कहना है कि "कोटे के भीतर कोटा" दलित एकजुटता को तोड़ने की एक राजनीतिक चाल है। वहीं, OBC वर्ग के भीतर 'क्रीमी लेयर' की गणना को लेकर भी नए सिरे से विवाद खड़ा हो गया है।
- जाति जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक कर आरक्षण का पुनर्गठन।
- निजी क्षेत्र (Private Sector) में भी आरक्षण की बढ़ती मांग।
- पदोन्नति में आरक्षण (Reservation in Promotion) पर स्पष्ट कानून।
📊 क्या है समाधान?
नीति विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रदर्शनों से हल नहीं निकलेगा। समाधान के लिए तीन स्तंभों पर काम करना होगा: 1. पारदर्शी डेटा: बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के सही आंकड़े जुटाना। 2. कौशल विकास: केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भरता कम कर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना। 3. संवाद: विभिन्न समुदायों के बीच एक साझा मंच तैयार करना ताकि सामाजिक सद्भाव बना रहे।
🧠 निष्कर्ष
आरक्षण केवल एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। 2026 के ये आंदोलन यह चेतावनी हैं कि यदि समय रहते नीतियों में तार्किक सुधार नहीं किए गए, तो यह सामाजिक असंतोष और गहरा सकता है। देश को आज एक ऐसे मॉडल की जरूरत है जो 'सामाजिक न्याय' और 'योग्यता' के बीच एक सेतु का काम करे।
